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सुरों की साधना और रागों का सफर : संगीतकार मन्नन शाह से विशेष बातचीत

आज के दौर में जहां संगीत ‘ट्रेंड्स’ और ‘सिंथ-बीट्स’ के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है, वहीं मन्नन शाह एक ऐसे कलाकार हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत और लोक धुनों की खुशबू को मुख्यधारा के सिनेमा में जीवित रखे हुए हैं। ‘कमांडो’ से लेकर ‘द केरल स्टोरी 2’ तक, उनकी यात्रा कला और समर्पण की एक अनूठी कहानी है। पेश है मन्नन शाह से हुई बातचीत के मुख्य अंश………..

 शुरुआती दौर और संगीत से जुड़ाव

सवाल : मन्नन जी, आपकी संगीत यात्रा की शुरुआत कैसे हुई? वह कौन सा पल था जब आपको लगा कि आप सिर्फ संगीत सुनना नहीं, बल्कि उसे बनाना चाहते हैं?

जवाब : मेरी संगीत यात्रा बचपन में ही शुरू हो गई थी। जब मैं महज 5 साल का था, तब मेरी माँ ने मेरे भीतर के कलाकार को पहचाना और मुझे शास्त्रीय संगीत की तालीम दिलाना शुरू किया। शुरुआती 10 वर्षों की शिक्षा ने मुझमें वह आत्मविश्वास जगाया कि 15-16 साल की उम्र तक आते-आते मैंने अपनी पहली धुन बनाई। दिलचस्प बात यह है कि उस पहली धुन का एक हिस्सा मुझे हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2’ के बैकग्राउंड म्यूजिक में इस्तेमाल करने का मौका मिला।

सवाल : आपकी परवरिश में शास्त्रीय संगीत (Classical Music) का क्या महत्व रहा? आपके गुरुओं ने आपकी संगीत सोच को किस तरह तराशा?

जवाब : शास्त्रीय संगीत से मेरा रिश्ता 30 साल पुराना है। मेरे पहले गुरु पंडित विनायक वोरा थे, जिनसे मैंने 11 साल शिक्षा ली। उन्होंने मुझे रागों की गहराई समझाई और उन्हीं के सानिध्य में मैंने अपने भीतर के ‘कंपोजर’ को पहचाना। 2006 में उनके निधन के बाद, 2009 से मैंने पद्म विभूषण उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहब से सीखना शुरू किया। मेरी यात्रा में खान साहब का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उनकी दी हुई तालीम की बदौलत हूँ।

सवाल : संगीत की शिक्षा और फिर इंडस्ट्री में कदम रखने के बीच का जो संघर्ष रहा, उसने आपको एक कलाकार के तौर पर कैसे बदला?

जवाब : संगीत को पेशे (Profession) से जोड़ना चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि संगीत हमेशा से मेरी व्यक्तिगत यात्रा रही है। मैं आज भी इसे सिर्फ एक पेशा नहीं मानता। मुझे इस बात से ज्यादा संतोष मिलता है कि मैं काम खत्म कर घर लौटूँ और अपना हारमोनियम खोलकर रियाज करूँ। मेरे लिए मेरा रियाज ही मेरा असली संगीत है।

रचनात्मक प्रक्रिया (Creative Process)

सवाल : आप एक ‘राग-आधारित’ संगीतकार माने जाते हैं। आज के ‘टेक्नो’ दौर में आप भारतीय रागों की प्रासंगिकता को कैसे देखते हैं?

जवाब : हमारे भारतीय संगीत में 150 से अधिक राग हैं, जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलेंगे। राग आधारित रचनाओं में एक ऐसी ताजगी (Freshness) होती है जो सदियों बाद भी नई लगती है। मेरा हालिया गीत ‘थारी जोगन’ राजस्थानी लोक संगीत और एक लोकप्रिय राग पर आधारित है। इस गाने पर बने 3500 से ज्यादा डांस कवर्स यह साबित करते हैं कि लोग आज भी अपनी मिट्टी के संगीत से कितनी गहराई से जुड़ते हैं।

सवाल : फिल्म संगीत तैयार करते समय आपकी प्राथमिकता क्या होती है?

जवाब : मेरे लिए स्क्रिप्ट, निर्देशक का विजन और मेरी धुन—इन तीनों का सही संतुलन जरूरी है। निर्देशक की संगीत की समझ और कहानी का दम, मुझे स्थिति के अनुरूप सही धुन बनाने के लिए प्रेरित करता है।

 गीतकार और गायकों के साथ तालमेल

सवाल : साहिल सुल्तानपुरी जैसे गीतकारों के साथ आपका तालमेल कैसा रहता है? क्या कभी धुनों और शब्दों के बीच कोई ‘क्रिएटिव मतभेद’ हुआ है?

जवाब : मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे साहिल सुल्तानपुरी जैसे गीतकार मिले, जिनके साथ मैंने ‘अखियां मिलावांगा’ और ‘थारी जोगन’ जैसे हिट गाने दिए। वे 10 से ज्यादा भाषाएं जानते हैं और व्याकरण की गहरी समझ रखते हैं। इसके अलावा जावेद अख्तर साहब के साथ 7 गाने करना मेरे लिए सौभाग्य की बात रही। मैं गीतकारों को पूरी आजादी देता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि शब्द ही गाने के चरित्र को परिभाषित करते हैं।

सवाल : आप अक्सर नए गायकों को मौका देते हैं। एक नई आवाज में आप क्या खूबी ढूंढते हैं?

जवाब : नए गायकों में एक ऐसी ‘अनसुनी’ ताजगी होती है जो श्रोताओं को आकर्षित करती है। आकांक्षा भंडारी, श्रुति शशिधरन और अब शाओनी (थारी जोगन) जैसी प्रतिभाओं को लॉन्च करना मेरे लिए खुशी की बात रही। नई टैलेंट के साथ काम करने का मजा ही कुछ और है।

फिल्म संगीत का बदलता स्वरूप

सवाल : आज गानों की ‘शेल्फ लाइफ’ कम हो गई है। आपके गाने लंबे समय तक कैसे टिके रहते हैं?

जवाब : मेरे गानों में रागों का प्रभाव और देश की मिट्टी की खुशबू होती है। मैं अच्छी शायरी और गहरी सोच को प्राथमिकता देता हूँ। चाहे वह 2013 का ‘सावन बैरी’ हो या आज के गीत, जब संगीत दिल से निकलता है, तो वह लंबे समय तक बना रहता है।

सवाल : ‘बैकग्राउंड स्कोर’ के क्षेत्र में आपकी हालिया एंट्री को लेकर आप कितने उत्साहित हैं?

जवाब : अब बैकग्राउंड म्यूजिक को फिल्मों में वह महत्व मिल रहा है जिसका वह हकदार है। आज यह फिल्म का ‘दूसरा हीरो’ माना जाता है। मुझे खुशी है कि मेरी यह यात्रा ‘द केरल स्टोरी 2’ जैसी बड़ी फिल्म से शुरू हुई।

व्यक्तिगत दर्शन और भविष्य

सवाल : संगीत के अलावा आपकी ऊर्जा कहाँ लगती है?

जवाब : संगीत के बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। यह मां सरस्वती की कृपा है कि उन्होंने मुझे संगीतकार बनाया। संगीत के अलावा मुझे कुछ और आता भी नहीं है, यही मेरा सब कुछ है।

सवाल : वह एक गाना कौन सा है जिसे सुनकर आपको लगता है कि “काश, यह मैंने बनाया होता”?

जवाब : मैं पुराने दिग्गजों—शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, एसडी बर्मन, पंचम दा—को सुनकर बड़ा हुआ हूं। हाल ही में लता जी की आवाज में सलिल चौधरी का कंपोज किया गाना सुना, ‘ओ सजना, बरखा बहार आई’। ऐसे गाने सुनकर हमेशा चाह होती है कि काश मैं भी अपने जीवनकाल में ऐसा कुछ रच सकूं।

सवाल : मन्नन शाह का ‘अल्टीमेट ड्रीम प्रोजेक्ट’ क्या है?

जवाब : मैं फिलहाल एक विशेष कलाकार जुहैब को लॉन्च करने की तैयारी कर रहा हूँ। वह देख नहीं सकते, लेकिन उनके पास संगीत, लेखन और अरेंजमेंट की असाधारण प्रतिभा है। दिव्यांग (Persons with Disabilities) कलाकारों को मेंटर करना और उन्हें मंच देना फिलहाल मेरे दिल के सबसे करीब है।

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